इंतज़ार शायरी

​हमने ये शाम चराग़ों से सजा रक्खी है;​​

​हमने ये शाम चराग़ों से सजा रक्खी है;​​ ​आपके इंतजार में पलके बिछा रखी हैं; ​हवा टकरा रही है शमा से बार-बार;​​ ​और हमने शर्त इन हवाओं से लगा रक्खी है।

ए पलक तु बन्‍द हो जा

“ए पलक तु बन्‍द हो जा, ख्‍बाबों में उसकी सूरत तो नजर आयेगी इन्‍तजार तो सुबह दुबारा शुरू होगी कम से कम रात तो खुशी से कट जायेगी ”

उनका भी कभी हम दीदार करते है

उनका भी कभी हम दीदार करते है उनसे भी कभी हम प्यार करते है क्या करे जो उनको हमारी जरुरत न थी पर फिर भी हम उनका इंतज़ार करते है !

जिसे दुनियाँ से जीतना था

उसके इंतजार के मारे है हम.. बस उसकी यादों के सहारे है हम… दुनियाँ जीत के कहना क्या है अब..?? जिसे दुनियाँ से जीतना था आज उसी से हारे है हम..

तेरे इंतजार मे कब से

तेरे इंतजार मे कब से उदास बैठे है तेरे दीदार में आँखे बिछाये बैठे है तू एक नज़र हम को देख ले इस आस मे कब से बेकरार बैठे है

कोई वादा नहीं फिर भी तेरा इंतज़ार है

कोई वादा नहीं फिर भी तेरा इंतज़ार है! जुदाई के बाद भी तुम से प्यार है! तेरे चेहरे की उदासी बता रही है! मुझसे मिलने के लिये तू भी बेकरार है!

उसने कहा अब किसका इंतज़ार है

उसने कहा अब किसका इंतज़ार है; मैंने कहा अब मोहब्बत बाकी है; उसने कहा तू तो कब का गुजर चूका है ‘मसरूर’; मैंने कहा अब भी मेरा हौसला बाकी है!

एक अजनबी से मुझे इतना प्यार क्यों

एक अजनबी से मुझे इतना प्यार क्यों है; इंकार करने पर चाहत का इकरार क्यों है; उसे पाना नहीं मेरी तकदीर में शायद; फिर हर मोड़ पे उसी का इंतज़ार क्यों है!

होंठ कह नहीं सकते

होंठ कह नहीं सकते जो फ़साना दिल का; शायद नज़रों से वो बात हो जाए; इस उम्मीद से करते हैं इंतज़ार रात का; कि शायद सपनों में ही मुलाक़ात हो जाए!

मजा तो हमने इंतजार में देखा है

मजा तो हमने इंतजार में देखा है, चाहत का असर प्यार में देखा है, लोग ढूंढ़ते हैं जिसे मंदिर मस्जिद में, उस खुदा को मैने आपमें देखा है